Sunday, 14 June 2009

राज़ कि एक बात

लो राज़ की बात एक बताते हैं
हम हँसकर अपने ग़म छुपाते हैं,

तन्हा होते तो रो लेते हैं जी भर के
आदतन महफ़िल मे बस मुस्कुराते हैं.

और होंगे जो झुक जाएँ रुतबे के आगे
सिर हम बस उसके दर पर झुकाते हैं

माँ मुझे फिर तेरे आँचल मे सोना है
आजा हसरत से बहुत देख बुलाते हैं

इसे ज़िद समझो या मेरा शौक़"औ"हुनर
चिराग हम तेज़ हवायों मे ही जलाते है

महल"औ"मीनार,दौलत कमाई हैं तुमने
पर प्यार से गैर भी गले हमे लगाते हैं

शराफत हमेशा नज़र झुका कर चलती हैं
निगाह मिलाते हैं हम नज़र नहीं मिलाते हैं

हैं ऊपर वाले की इनायत मुझ पे "दीपक "
वो मिट जाते जो मुझ पर नज़र उठाते हैं



सर्वाधिकार सुरक्षित @ कवि दीपक शर्मा

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Friday, 12 June 2009

नही समय किसी का साथी रे !

नहीं समय किसी का साथी रे !
मत हँस इतना औरों पर कि
कल तुझको रोना पड़ जाये
छोड़ नर्म मखमली शैय्या को
गुदड़ पर सोना पड़ जाये
हर नीति यही बतलाती रे !
नहीं समय किसी का साथी रे !

तू इतना ऊँचा उड़ भी न कि
कल धरती के भी काबिल न रहे
इतना न समझ सबसे तू अलग
कल गिनती में भी शामिल न रहे
प्रीति सीख यही सिखलाती रे !
नहीं समय किसी का साथी रे !

रोतों को तू न और रुला
जलते को तू ना और जला
बेबस तन पर मत मार कभी
कंकड़- पत्थर , व्यंग्यों का डला
अश्रु नहीं निकलते आँखों से
जीवन भर जाता आहों से
मन में छाले पड़ जाते हैं
अवसादों के विपदाओं से
कुदरत जब मार लगाती रे !
नहीं समय किसी का साथी रे !

इतना भी ऊँचा सिर न कर
औरों का कद बौना दिखे
इतनी भी ना कर नीचे नज़र
हर चीज़ तुझे नीची दिखे,
खण्ड - खण्ड अस्तित्व हो जाता है
पर लोक, ब्रह्माण्ड हो जाता है
साँसों कि हाट उजड़ जाती
जब संयम प्रचंड हो जाता है
हर सदी यही दोहराती रे !
नहीं समय किसी का साथी रे !

इतना मत इतरा वैभव पर
अस्थिर धन के गौरव पर
पाण्डव का हश्र तुझे याद नहीं
ठोकर खायी थी पग - पग पर
मत हीन समझ औरों को तू
मत दीन समझ औरों को तू
मत हेय दृष्टि औरों पर डाल
मत वहम ग़लत ह्रदय में पाल
पल में पासा फ़िर जाता है
जब प्रकति नयन घुमाती रे !
नहीं समय किसी का साथी रे !

काया पर ऐसा गर्व ना कर
यौवन का इतना दंभ न भर
ना नाज़ कर इतना सुन्दरता पर
द्रग पर, केशों पर, अधरों पर
है नहीं ये कोई पूंजी ऐसी
जो आयु के संग बढती जाये
जैसे - जैसे चढ़ती है उमर
ये वैसे - वैसे घटती जाये
अस्थि - अस्थि झुक जाती रे !
नहीं समय किसी साथी रे !

मत भाग्य किसी का छीन कभी
दाना हक़ से ज्यादा न बीन कभी
चलता रह अपनी परिधि में
पथ औरों का मत छीन कभी
वरना ऐसा भी तो हो जाता है
दाना अपना भी छिन जाता है
परिधि अपनी भी छुट जाती है
और भाग्य ही जड़ हो जाता है
जब एक दिन गगरी भर जाती रे !
नहीं समय किसी का साथी रे !


( उपरोक्त पंक्तियाँ काव्य संकलन फलक दीप्ति से ली गई है )

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Monday, 1 June 2009




बुद्धम शरणं गच्छामि................


दो पल सुख से सोना चाहे पर नींद नही पल को आए
जी मचले हैं बेचैनी से ,रूह ना जाने क्यों अकुलाए
ज्वाला सी जलती हैं तन मे ,उम्मीद हो रही हंगामी .....
बुद्धम शरणं गच्छामि................


मन कहता हैं सब छोड़ दूँ मैं,पर जाने कैसे छुटेगा ये
लालच रोज़ बढ़ता जाता हैं,लगती दरिया सी तपती रेत
जब पूरी होती एक अभिलाषा ,खुद पैदा हो जाती आगामी......
बुद्धम शरणं गच्छामि................


नयनो मे शूल से चुभते हैं, सपने जो अब तक कुवारें हैं
कण से छोटा हैं ये जीवन और थामे सागर कर हमारे हैं
पागल सी घूमती रहती इस चाहत मे जिन्दगी बे-नामी........
बुद्धम शरणं गच्छामि................


ईश्वर हर लो मन से सारी, मोह माया जैसी बीमारी
लालच को दे दो एक कफ़न ,ईर्ष्या को बेवा की साड़ी
मैं चाहूँ बस मानव बनना ,मांगू कंठी हरि नामी ....

बुद्धम शरणं गच्छामि................


(उपरोक्त रचना कवि दीपक शर्मा की अप्रकाशित रचना है। सर्वाधिकार सुरक्षित @ कवि दीपक शर्मा )


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Sunday, 1 March 2009

ग़ज़ल

मेरे हाथों से तेरा हाथ यूँ छूटता गया ,
जैसे सितारा फलक से टूटता गया ।

गम ये नही की लुट गई हसरते - हयात
ग़म है जिसे नहीं लूटना था लूटता गया ।

बदकिस्मती कहूँ इसे या और कुछ कहूँ
जिसको भी दिल ने चाहा वही रूठता गया ।

मिलने थे जहाँ साये बिछुडे वहां पर हम
साहिल पे बदनसीब कोई डूबता गया ।

हंसती रही हयात मगर रोते रहे जज़्बात
अन्दर ही अन्दर दरख्त कोई सूखता गया

सारे जहाँ का "दीपक" इतना अफसाना है
गुल टूटता गया और गुंचा फूटता गया ।


(उपरोक्त ग़ज़ल काव्य संकलन falakdipti से ली गई है )



ग़ज़ल

साँस जाने बोझ कैसे जीवन का जीती रही
नयन बिन अश्रु रहे पर ज़िन्दगी रोती रही ।

एक नाजुक ख्वाब का अंजाम कुछ ऐसा हुआ
मैं तड़पता रहा इधर वो उस तरफ रोती रही ।

भूख, आंसू और गम ने उम्र तक पीछा किया
मेहनत के रुख पर जर्दियाँ, तन पे फटी धोती रही ।

उस महल के बिस्तरे पर रोते रहे कुत्ते - बिल्लियाँ
धूप में पिछवाड़े एक बच्ची छोटी रोती रही ।

आज तो उस मां ने जैसे - तैसे बच्चे सुला दिए
कल की फ़िक्र पर रात भर दामन भिगोती रही ।

तंग आकर मुफलिसी से खुदकुशी कर ली मगर
दो गज कफ़न को लाश उसकी बात जोहती रही ।

'दीपक' बशर की ख्वाहिशों का कद इतना बढ गया
ख्वाहिशों की भीड़ में कहीं ज़िन्दगी खोती रही ।

( उपरोक्त ग़ज़ल काव्य संकलन मंज़र से ली गई है )

ग़ज़ल

जिस पर मुझे जरूरत से ज्यादा गुमान था
दिल उस शख्श का बहुत बेईमान था ।

बिखरा हुआ पढ़ा था एक साया उसके पास
कोई अजनबी नहीं वो मेरा अरमान था ।

कहकहों में बज्म के दब गई सिसकी मेरी
मामूली थी हस्ती मेरी , बहुत छोटा निशान था ।

खुश था जिसे फूंककर मज़हबी जूनून में
बाद में मालुम हुआ वो मेरा मकान था ।

दोस्ती भी दोस्तों ने निभाई तो किस जगह
बस जिंदगी से चार कदम दूर शमशान था ।

भूख का कोई कहीं मज़हब 'दीपक' होता नहीं
काफिर के साथ खा गया जो मुसलमान था ।

( उपरोक्त ग़ज़ल काव्य संकलन मंज़र से ली गई है )

ग़ज़ल

तेरी हर बात पे हम ऐतबार करते रहे
तुम हमें छलते रहे,हम तुमसे प्यार करते रहे ।

कोशिशें करते तो शायद मंजिले मिल जाती
मगर अफ़सोस तुम वादे हज़ार करते रहे ।

नाम भी मेरा उन्हें याद तक नहीं आया
जिनको अपनों मे हम शुमार करते रहे ।

मुझको मालूम था तुम नहीं आओगे फिर भी
एक उम्मीद सी लिए इन्तिज़ार करते रहे ।

ज़िन्दगी यूँ तो गुज़र रही है पहले की तरह
पर घाव पिछले कुछ जीना दुश्वार करते रहे ।

याद आते ही तुम्हारी सीने के समंदर से
अश्क भर -भर के नयन बौछार करते रहे ।

एक घर में कहकहे और शहनाई की आवाज़
'दीपक' अरमान मेरा तार - तार करते रहे


( उपरोक्त ग़ज़ल काव्य संकलन मंज़र से ली गई है )