Friday, 18 December 2009

ऐसी मुश्किल ...............................

ऐसी मुश्किल तो प्यारे पग पग पर आएगी
जो दुनियादारी न सिखलाये ,क्या दुनिया कहलाएगी
जुगनू के मुँह से सूरज की अब बाते सुनते हैं
कहने वाले कहते रहते ,भला कब सुनते हैं
अपनी दानिशमंदी का भी तो देना हैं इम्तिहान
चाहे बेशक क्यों न हो जाए चमन शमशान
तेरी मेहनत पर उनकी भी मोहर लग जायेगी
जो दुनियादारी न सिखलाये, क्या दुनिया कहलाएगी

सर्वाधिकार सुरक्षित @ दीपक शर्मा
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Monday, 30 November 2009

मैं तो सिर्फ़ इतना ही जनता हूँ .........................

मैं तो सिर्फ़ इतना ही जानता हूँ
मुझमे क्या है ये पहचानता हूँ

हुनर किसी पहचान का मोहताज़ नहीं
ये तुम भी मानते हो,मैं भी मानता हूँ

मेरे पावों के निशाँ कभी तो पढेगा ज़माना
इसलिए शहर दर शहर ख़ाक छानता हूँ

उधार की नहीं मुझमे अपनी ही रोशनी है
यूं फ़ख्र से चलता हूँ, सीना तानता हूँ

तुम इसे मेरा गुरूर न समझना "दीपक"
पाकर ही दम लेता हूँ जो भी ठानता हूँ


All right reserved@Kavi Deepak Sharma
http://www.kavideepaksharma.com

Tuesday, 10 November 2009

राजनीति मे न्यूनतम शिक्षा का मापदंड होना ज़रूरी है

बहुत पुरानी कहावत है कि "विद्या ददाति विनयम्". आप सबको इस श्लोक की यह पंक्ति ज़रूर याद होगी .जीवन के प्रारंभ मे ही इस तरह की पंक्तियाँ विधालय मे हर छात्र को पढाई जाती हैं. यह सब इसलिए नहीं कि हम पढ़कर परीक्षा उतीर्ण कर लें और अगली कक्षा मे पहुँच जाएँ. अपितु ये हमारी बौद्धिक बुनियाद को सुद्रढ़ करने के लिए हैं और यह समझाने का प्रयास है कि जितना पढोगे और जैसा अच्छा पठन होगा जीवन उतना ही सरल, उत्तम और परिपक्व होगा. जिसका लाभ इस समाज को मिलेगा और समाज इस कारण उन्नति करेगा. फिर समाज के साथ साथ देश भी तरक्की करेगा. मतलब देश के साथ साथ आम आदमी का गौरव भी बढेगा या आप इसे उल्टा भी कह सकते हैं की आम आदमी के साथ साथ देश का गौरव भी बढेगा. बात को किसी भी तरह से कह लीजिये लौट कर वहीँ आ जायेंगे "विद्या ददाति विनयम्".

राजतंत्र मे पहले राजा के सिपहसालार और मंत्री अपनी एक ख़ास पहचान रखते थे और जो भी जिस विद्या या कला ने निपुण होता था उसे उसी की क्षमता के लिहाज से विभाग बाँट दिए जाते थे. वहां केवल गुण और निपुणता मायने रखती थी ना की आरक्षण और सिफारिश या वर्ण भेद या ज़ाति विशेषता. सब अपनी अपनी कला मे माहिर और निपुण. राजा भी उनकी बात को गौर से सुनता था और उनकी सलाह से निर्णय लेता था. कई कई भाषाओ का ज्ञान होता था राजा को, मंत्री को और रणनीतिकारों को. उसकी वजह थी कि विभिन्न भाषा -भाषी प्रजा कि बात समझना और उनकी बेहतरी के लिए निर्णय लेना .

कहने का तात्पर्य यह है कि राज्य के कर्णधार अति शिक्षित होते थे और समय के हिसाब से निर्णय लेते थे. एक उम्र के बाद जब शारीरिक और मानसिक शक्तियां क्षीर्ण होने लगती हो अपने यथा योग्य उत्तराधिकारी को सब अधिकार देकर संन्यास आश्रम मे प्रवेश कर लेते थे . और शायद यही उस राज्य या क्षेत्र की उन्नति का कारण था. जितना शिक्षित राजा और राजा का मंत्रिमंडल और सभासद उतना की उन्नत साम्राज्य. बिना किसी आदेश के और नियम के यह परिपाटी चलती रही और शासन चलता रहा. जिस किसी भी राजा ने इस नियम का पालन नहीं क्या वो इतिहास भी ना बन सका और इतिहास के पन्नो मे ही खो गया. आज हम सिर्फ उन्ही राजा महाराजाओं को याद करते है जो समाज मे अपनी पहचान छोड़ गए।

समय ने करवट ली और प्रजा ही राजा बन गई .लेकिन हम इस राजसत्ता की चाहत मे बहुत कुछ पीछे छोड़ आये। आरक्षण ,वर्णवाद ,जातिवाद ,धर्मवाद ,क्षेत्रवाद ,वंशवाद ना जाने क्या क्या समां गया हमारी राजनीति मे और देश एक अँधेरे कुँए मे गिरता रहा. आज तो हालत यह हो गए की पता ही नहीं चल रहा कि राजनेता कौन हैं और मूढ़ कौन . सिर्फ ज़ाति,धरम ,वंश , क्षेत्र ,भाषा के नाम पर राजनेता चुन कर आते हैं और किस भाषा का प्रयोग करते हैं आप सब से तो छिपा ही नहीं है."मतलब देश लगातार दुखों को सह रहा है."

जब इस देश मे हर पद ,ओहदे और पदवी के लिए एक शारीरिक ,शेक्षिक,और आयु का मानदंड है तो राजनीति मे क्यों नहीं?यह बात आज तक गले के नीचे नहीं उतरती.राजनीति मे भी एक मापदंड होना चाहिए कि कोई भी नेता पहले एक स्नातक या समकक्ष हो और मंत्री पद के लिए उसके पास उस क्षेत्र की परा स्नातक योग्यता या समकक्ष तकनीकी निपुणता हो और जिस विभाग का मंत्रिपद उसे दिया जा रहा है उसका उपमंत्री पद का कुछ वर्ष का अनुभव हो . राजनेता का शारीरिक मापदंड भी निर्धारित किया जाए.हर सरकारी और गैर सरकारी कर्मियों की तरह इनका भी वार्षिक आंकलन किया जाए .जितने दिन यह अपने संसदीय क्षेत्र या संसद मे अनुपस्थित रहे इकना भी वेतन कटा जाए.अगर निर्धारित मानदंड से नीचे पाया जाए तो इनकी सदस्यता तत्काल से समाप्त कर दी जाये।

आप सब सोच कर हंस रहे होगे की यह भी क्या अनाप शनाप लिखे जा रहा है .परन्तु मेरे मित्रों यह तो करना की होगा अगर कल का सवेरा देखना हैं."रथ को तेज़ दौड़ाना है तो घोडों के साथ साथ सारथी भी निपुण और चतुर होना चाहिए.


मेरी साँसों में यही दहशत समायी रहती है
मज़हब से कौमें बँटी तो वतन का क्या होगा ।


यूँ ही खिंचती रही दीवार ग़र दरम्यान दिल के
तो सोचो हश्र क्या कल घर के आँगन का होगा


जिस जगह की बुनियाद बशर की लाश पे ठहरे
वो कुछ भी हो लेकिन ख़ुदा का घर नहीं होगा ।


मज़हब के नाम पर कौ़में बनाने वालों सुन लो तुम
काम कोई दूसरा इससे ज़हाँ में बदतर नहीं होगा ।


मज़हब के नाम पर दंगे, सियासत के हुक्म पे फितन
यूँ ही चलते रहे तो सोचो , ज़रा अमन का क्या होगा ।


अहले -वतन शोलों के हाथों दामन न अपना दो
दामन रेशमी है देख लो फिर दामन का क्या होगा ।

ना जाने कितने ही नेताओ की शेक्षिक योग्यता किसी सरकारी दफ्तर के एक चतुर्थ श्रेणी कर्मी से कम है और वो देश के कर्णधार बने हुए हैं. जिनका अपना बौद्धिक विकास नहीं हुआ वो क्या सोच सकते हैं देश के विकास के बारें मे. यह तो कुछ वैसा ही हो गया कि एक ज़र्राह किसी के ह्रदय की शल्य चिकित्सा कर रहा हो. आप स्वयं ही अनुमान लगा लें की परिणाम क्या होगा. जब एक कील बनाने वाला विमान बनाने की सलाह देगा तो परिणाम की अपेक्षा करना भी जुर्म हैं.

आज रोज़ अखबार मे राजनेताओ की गाली गलौज और एक दूसरे पर उलाहना और अपमान पढने और सुनने को मिलता है .सड़कों पर खुले आम आरोप प्रत्यारोप और वो भी अभद्र भाषा मे. सोचकर ही डर लगता है कि आने वाले दिन कितने भयाभय है , ज़रा कल्पना कीजिये .यह सब उनकी योग्यता के हिसाब से नहीं है और कुपात्र को जब सत्ता मिल जाती है तो उसे कुछ भी याद नहीं रहता वो पहले अपना घर भरता है और बाद मे दूसरों से लड़ता है. हर सही निर्णय उसे गलत नज़र आता है क्योंकि उसके सिपहसालार द्वारा निर्णय उसे समझ नहीं आता और फिर अपने राजनेता या मंत्री होने का भी तो उसने अधिकार प्रयोग करना है .बस अपनी सोच से वो उसे संशोधित कर देता है और हो जाती है एक ज़र्राह द्वारा शल्य चिकित्सा और परिणाम मे मिलती है मृत देह. इन्ही ज़र्राहों कि शल्य चिकित्साओं से देश ही देह रोज़ चिर रही है.
कम लिखे को ज्यादा समझें और लेख नहीं इशारा माने .आप सब खुद इस देश के जिम्मेदार नागरिक हैं

कवि दीपक शर्मा
186,Second Floor,Sector-5,Vaishali,Ghaziabad(U.P.)
http://www.kavideepaksharma.com

ग़ज़ल

मेरी सच बात का उसने यूँ जवाब दीया
अजनबी कह दिया ,गैर का खिताब दीया।

चलो छोडो कोई बात और करो ना अब
जुमला कहके यही मुझपे बना दबाब दीया।

बुतपरस्त कह कर ज़माना बुलाता हैं मुझको
मैंने तस्वीर पे उसकी यूँ गिरा नकाब दीया।

ज़िन्दगी कहता है और मूद्दतों नहीं मिलता
और जब भी मिला ,मुझको सूखा गुलाब दीया।

हम दोस्त हैं,नहीं दोस्ती मारा करती कभी
बेवफाई का अपनी यह उसने हिसाब दीया।


कसीदे ज़माल के तेरे पदेगा शायर “दीपक ”
हुनर ख़ुदा ने मुझे यूँ ,तूझे हिज़ाब दीया।

सर्वाधिकार सुरक्षित @ दीपक शर्मा

Friday, 30 October 2009

इंदिरा

उस रोज़ बिलख कर रोया था जन - जन भारत का
जब कोख उजाड़ी थी घर के कुछ गद्दारों ने
छलनी - छलनी कर दिया जिस्म एक बेटी का
आँखों के आगे तन ही के पहरेदारों ने .

टिकी हुई थी उस पर कितनी आशायें
स्तम्भ थी वह कितने अधखिले सपनों का
फ़िक्र नहीं थी खुद की कुछ उसको लेकिन
दर्द भरा था मन में , गैरों का , अपनों का .

कितने नए रास्ते उसने हमको दिखलाया
दुनिया में खुद नित आगे बढना सिखलाया
रोज़ बताई नयी तरक्की की राहें
धरती से उठ चाँद पर चलना बतलाया

सहरा के सीने चीर निकली सरिताएं
बंजर का तोड़ अभिमान उगाई हरियाली
बना देश में गोली से लेकर एटम बम
खुद बनवाई तोप , विमान और दोनाली .

इसी बीच अपना छोटा बेटा भी खोया
लेकिन स्वदेश की खातिर रो भी पाई
पी लिए आँख - ही आँख में अश्रु सागर
अस्तित्व ही क्या अर्पित थी देश को परछाई

हर युवक उसको अपना ही सुत दीखता था
कितनों की होकर भी वो जननी थी
यदि विचलित कर देती उस क्षण धैर्य अपना
खुद करो कल्पना हालत तब क्या होनी थी

हर मजहब को उसने अपना मजहब माना
हर दीन में देखा तो बस इंसान देखा
मंदिर में जाकर नाम पुकारा अल्लाह का
मस्जिद में जाकर देखा तो बस भगवान देखा

जीवन में सब कुछ चल रहा था ठीक -ठाक
बढ रहे थे नित उन्नति की ओर कदम
लेकिन घर में निकले कुछ ऐसे विद्रोही
थम गई अचानक जिससे प्रगति की सरगम

कुछ ओर मचा था शोर बहुत अलगाव का
फ़ैल रही थी आँगन - आँगन घ्रणित आग
ये दुश्मन थे , ही दुश्मन के गोले
अपने ही घर के थे कुछ सिरफिरे चिराग

जा - जाकर इनके पास हिंद की बेटी ने
बहुत जोड़े हाथ , समझाया , बहुत विनती की
संग मिलकर चले से थर्रा जाता नभ भी
अलग - अलग चलने से नहीं धरा हिलती

लेकिन जब देखा रोज़ बढ रही हैं लपटे
निशि -दिन और बढ रही हैं ज्वाला
छु ले कोई चिंगारी घर का आँगन यूँ
ऐसे विद्रोही दीपो को ही बुझवा डाला

इस गौरवमयी , साहसी नारी निश्चय ने
तोड़ दिये जाने कितने विद्रोही अरमान
होता ये की गले लगाते, प्रेम बरसाते
उल्टे बदले में छीन लिए उसके प्राण

दिवस इकत्तीस अक्तूबर सन चौरासी का
कर गया तबाह अचानक सारी फुलवारी
क्यूँ छीन ली मुझसे मेरी बेक़सूर बेटी
आज पूछ रही है प्रश्न भारत मां बेचारी

क्या दोष था उसका जो ये उसको दंड मिला
उसने तो सबको लगा गले कलेजे चलना चाहा
हिटलर बन आदेश नहीं दिया जन को
बल्कि जनादेश के बल पर बढना चाहा

क्र्तघ्न कोई चाहे क्यों हो जाये
पर माटी तेरा क़र्ज़ चूका नहीं सकती
इस देश की खातिर तेरी इस कुर्बानी को
अस्तित्व तक ये धरा भुला नहीं सकती

यूँ तो "दीपक" इस दुःख की कोई थाह नहीं
अंग - अंग रोता है और द्रवित मन है
लेकिन ! हिंद की बेटी तेरी कुर्बानी को
इस भारत का कोटि - कोटि नमन है

सर्वाधिकार सुरक्षित @ दीपक शर्मा