Sunday, 7 March 2010

नारी दिवस

From Shayar Deepak Sharma



नारी प्रकृति की मानव समाज को ईश्वर द्वारा बख्शी गई सबसे श्रेष्ठ एवम अतुलनीय मानस कृति है.नारी सम्पूर्ण कायनात है .अपने आप में एक सम्पूर्ण संसार है .नारी ने इस संसार को जिसके हम अंश है जन्मा है.यह सब कुछ जो भी यहाँ मानवीय या दैवीय अथवा किसी भी रूप में बिद्यमान है,इसका परोक्ष रूप से नारी का ही दिया हुआ आशीर्वाद है .हम इस ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकते और न ही होना चाहते हैं . ये हमारा ही दुर्भाग्य है कि हम जिस कोख से पैदा होते हैं उसी को दुत्कारते हैं .उसी को उसका हक नहीं देते .हम नारी से उम्मीद तो करते है पर उसकी उम्मीद नहीं बनते .हम "महिला दिवस "पर इस शक्ति स्वरूपा को प्रणाम करते हैं और नमन करते हैं .....

कवि दीपक शर्मा
सर्वाधिकार @कवि दीपक शर्मा

Tuesday, 26 January 2010

जिनके दामन में दौलत नहीं गम होते हैं ......

जिनके दामन मे दौलत नहीं ग़म होते हैं
उन मुसाफ़िरों के हमसफ़र कम होते हैं ।

जो उसूलों की बात करता है ज़माने मे
उसके लम्हे -हयात जल्दी खत्म होते हैं ।

बेवफ़ाओं की राह में फूलों की बारिश
वफ़ादारों पे पत्थरों के करम होते हैं ।

अब शहर देखकर ही हवाएं चला करती हैं
इंसान की तरह होशियार मौसम होते हैं ।

उनसे हर वक़्त ख़ुदा भी ख़फ़ा रहता है
जिनपे पहले से ही लाख़ सितम होते हैं ।

घर में मौत और जश्न का माहौल या रब
जबकि ग़ैरों के दर पे मातम होते हैं ।

और ज़्यादा की आरज़ू में , खो गई आबरू
ख़ुद पे शर्मसार "दीपक" लोग कम होते
हैं ।


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Friday, 18 December 2009

ऐसी मुश्किल ...............................

ऐसी मुश्किल तो प्यारे पग पग पर आएगी
जो दुनियादारी न सिखलाये ,क्या दुनिया कहलाएगी
जुगनू के मुँह से सूरज की अब बाते सुनते हैं
कहने वाले कहते रहते ,भला कब सुनते हैं
अपनी दानिशमंदी का भी तो देना हैं इम्तिहान
चाहे बेशक क्यों न हो जाए चमन शमशान
तेरी मेहनत पर उनकी भी मोहर लग जायेगी
जो दुनियादारी न सिखलाये, क्या दुनिया कहलाएगी

सर्वाधिकार सुरक्षित @ दीपक शर्मा
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Monday, 30 November 2009

मैं तो सिर्फ़ इतना ही जनता हूँ .........................

मैं तो सिर्फ़ इतना ही जानता हूँ
मुझमे क्या है ये पहचानता हूँ

हुनर किसी पहचान का मोहताज़ नहीं
ये तुम भी मानते हो,मैं भी मानता हूँ

मेरे पावों के निशाँ कभी तो पढेगा ज़माना
इसलिए शहर दर शहर ख़ाक छानता हूँ

उधार की नहीं मुझमे अपनी ही रोशनी है
यूं फ़ख्र से चलता हूँ, सीना तानता हूँ

तुम इसे मेरा गुरूर न समझना "दीपक"
पाकर ही दम लेता हूँ जो भी ठानता हूँ


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