Monday, 26 September 2011

समाज की दुर्दशा और आवाम खामोश

समाज की दुर्दशा और आवाम खामोश ..बड़ी हैरत की बात है ..लेकिन ये सब मुमकिन है ,यहाँ सब कुछ हो सकता है .ये हिंदुस्तान है मेरे भाई. सब्जीवाला अगर एक आलू कम तौल दे तो सब्जी काटने वाले चाक़ू से ही उसका क़त्ल हो जाता है और उसके परिवार वालों को चोर खानदान कह दिया जाता है. गली से घर वालों का निकलना मुश्किल हो जाता है. हर चलता फिरता ताने और तंज़ कसता जाता है. मानो इस आदमी में समाज का बेडा गर्क कर दिया और देश को इससे अपूर्णीय क्षति हुई है....दो आलू किसी का घर बर्बाद करने के लिए काफी हैं और क़त्ल करने वाला बहुत गर्व से ,सीना चौड़ा कर कहता है ...मैं असत्य बर्दाश्त नहीं कर सकता ...समाज में चोर नहीं पैदा होने चाहिए ....मैंने जिंदगी में कभी कोई भी गलत काम नहीं क्या और गलत देख कर मेरा खून खौल उठता है..मुझे अपने किये पर कोई अफ़सोस नहीं है...(शायद एक नेता का जन्म हो रहा है ....)

लेकिन अफ़सोस कि इस देश के नेता जो कि अधिकतर गरीब घर से आये और कु
छ सालों में ही कुबेर हो गए आवाम का पैसा खाकर जो कर और संचय निधि के रूप में इस देश कि तरक्की के लिए दिया था ...उस पर हम सब बिना क्रिया -प्रतिक्रिया दिए हुए खामोश बैठ गए ।हमारे मुहं से एक शब्द भी नहीं निकलता उनके खिलाफ . कोई भी पूछने वाला नहीं इसका हिसाब ...क्या हमने आत्मसमर्पण कर दिया है.क्या ये हमारी नज़र में जुर्म नहीं है ?क्या ये एक सब्जी वाले कि हरक़त से छोटा अपराध हैं? शायद इस बात का हमारे पास ज़वाब नहीं है या हम इस बात का ज़वाब ही नहीं देना चाहते .वज़ह कोई भी हो पर सत्य है कि हम डरते हैं . कभी ख़ुद से कभी औरों से. समाज के प्रति हमारा दायित्व केवल आलोचना करना है सिर्फ आलोचना . और उन बातों पर प्रतिक्रिया करना जिनका हमारी जिंदगी में कोई ख़ास मलतब नहीं है .

हमें ये बात बाखूबी पता है....आज किसी ताक़तवर से उलझ गए तो कल नौकरी से भी जायेंगे ...घर से भी ..परिवार से भी ...और पता नहीं क्या -क्या हो जाए ..ज़िन्दगी के साथ...इसीलिए भैया खामोश रहो और ऐसे देखो जैसे कुछ देखा -सुना नहीं. (शायद एक नपुंसक का ज़न्म हो रहा है. हमारे भीतर ...)
दरअसल हमे आदत हो गई है किसी भी हालात और माहौल में ढलने की. सहने की .चुप रहने की और बिना मतलब के वाकियात पर उलझने की .
हमे अपने सवालों का ज़वाब लेना नहीं आता . ज़रा किसी ने प्यार से पुचकार लिया और हम हिन्दुस्तानी लोग भूल गए सब बीती पुरानी,अगली-पिछली और भटक गए अपने सवाल से.जिसका नतीजा आज हमारे सामने है ...ये अस्थिर और असामान्य एवं अनियंत्रित समाज. समाज ने अपना संतुलन खो दिया है .विचारधाराओं में फर्क आया हैं . लोगों के मन में कुंठा पल रही है ..आपस में एक- दुसरे के लिए दुर्भावना हैं . समाज पतन की ओर बड़े दंभ और दिखावटी नज़रिए के साथ आगे बड़ रहा है ..जो हमे आज तो सुख देगा पर कल बहुत कुछ और भी भयाभय हकीक़त बिन मांगे देगा. (शायद अभिमन्यु चक्रव्यूह में फंस रहा है हमारे भीतर ...)
संवेदना और आदमियत दोनों का ही पलायन हो चुका है हमारी -आपकी जिंदगी से ...राह में कोई मर जाता है किसी दुर्घटना में तो हम पीछे मुड़ कर भी नहीं देखते ...लाश के ऊपर से गाड़ियाँ दौड़ाते,कुलाचें भरते ..हवा से बात करते हुए ..मुर्दे को रौंदते हुए निकल जाते हैं ..वो सिर्फ इसलिए कि मरने वाला अपना नहीं है...पुलिस के चक्कर में कौन पड़े...लेने के देने ना पड़ जाएँ..सरकार मुआवजा दे देगी.......पैदल चलने वाला ख़ुद देख कर तो चलता नहीं और साला मर जाता है तो गाड़ी वाले कि मुसीबत हो जाती है...ये ही ख्याल आते हैं ना मन के अन्दर... छी: लानत हैं हमे अपने आप को इंसान कहते हुए.. (शायद एक राक्षस का जन्म हो रहा है हमारे भीतर ......)
"चल कमला ये सब्जी ताज़ी है तू ले जाना और देख आराम से खाना स्वाद लेकर....रात ही बनाई थी लेकिन तुझे तो पता है ना कि तेरे भाई साहिब दुबारा नहीं खाते ...नखरे जयादा हैं ना ..." ये आप जिंदगी में रोज़ कहीं ना कहीं सुनते होंगे ...तीन -चार दिन की पुरानी ,बासी सब्जी जब हमसे नहीं खाई जाती और बदबू देने लगती है और लगता है कि इसे खाकर अब तो हमारी तबियत खराब हो जाएगी तो हम अपने काम करने वाले को देकर एहसान कर देते है और ख़ुद को दानवीर दिखाने की कोशिश करते हैं॥अरे सोचो ज़रा जो चीज़ हमे अच्छी नहीं लगते तो काम करने वाले तो कैसे अच्छी लगेगी ..क्या वो इंसान नहीं है? क्या उसके अन्दर लोहे की मशीन लगी है जो सब पचा लेगी ? ...

नहीं- नहीं ,काम वाली सब हज़म कर लेगी क्योंकि वो काम वाली है ...उसे ३२ रूपये में दिन भर गुज़ारना है ......उफ़ बहुत दर्दनाक स्थिति है....कोई सोचता क्यों नहीं ...क्या हम खुदगर्जी की चरम सीमा पर हैं...(शायद एक लोमड़ी का जन्म को रहा है हमारे भीतर....)
दिल के दुःख तो बहुत हैं ..धीरे धीरे सब सामने आते जायेंगे ..आज आइना देखा तो इतना ही देख पाया ..इससे ज्यादा देखने की ना हिम्मत थी और ना ही आँख में रौशनी ....अपनी एक ग़ज़ल आपको नज़र करता हूँ जो कुछ भी बयान करें पर आप समझ लोगे.....
"दिलक़त्ल हादसों से , नाम क्यों नहीं नज़र होती
नीयत अब तेरी क्यों बशर जैसी नहीं बशर होती ।

कोई भोजन भरे थालों में हाथ रोज़ धोता है
किसी को एक वक़्त की रोटी नहीं मयस्सर होती ।

वतन सियासत की बदौलत बुनियाद से हिल जाता है
मगर सियासत है कि ,कभी इधर से नहीं उधर होती ।

रास्ते हैं सलामत तो मुसाफिर ख़ुद चलकर आयेंगे
होता है खानावदोश इंसान ही बस , नहीं डगर होती ।

किताबों में पढ़ेंगी कल "दीपक"नस्लें फल -मेवों की बाबत
हुकूमत आवाम की खैरख्वाह अब भी नहीं अगर होती ।

सर्वाधिकार सुरक्षित @ दीपक शर्मा

Thursday, 18 August 2011

एक आवाज़ अन्ना हजारे के समर्थन में

हाथ खोलो ,घर से निकलो ,कब तलक खामोश रहोगे
बात अपनी अब तो कह दो ,कब तलक खामोश रहोगे
बढ के अपना मांग लो हक़,किस बात का है खौफ तुमको
कब तलक मिमयाते रहोगे ,कब तलक खामोश रहोगे ..


ख़ुद ज़हर पीकर भला क्यों, हम दूध सांपो को पिलायें
क्यों भूखे रखकर अपने बच्चें, रोटी सियासत को खिलाएं
दब के हुकुमत से रहें क्यों ,हम ही जब सरकार बनाएं
सरकार है आवाम की , फिर क्यों वो आवाम को सताएं
ज़ुल्म कब तलक सहते रहोगे, कब तलक खामोश रहोगे
हाथ खोलो ,घर से निकलो ,कब तलक खामोश रहोगे .

पैदा होने से मरण तक , तुम बांटते रहना बस रिश्वत
पढाई-लिखाई,और कमाई कब तलक समझोगे किस्मत
हक़ की तरह हक़ को मांगो,भीख मत तुम समझो हज़रत
वरना इन दुर्योधन के हाथों बच ना सकेगी घर की अस्मत
अब तो तुम गांडीव उठा लो ,कब तलक खामोश रहोगे
हाथ खोलो ,घर से निकलो ,कब तलक खामोश रहोगे .

हक़ है तुम्हें ये पूछने का , रंक से बने तुम कैसे राजा
ग़र है कोई आसान रस्ता ,तो मन्त्र वो सबको बता जा
या मान लो फिर सिर झुकाकर, जम्हूरियत शर्मिंदा की है
तुमने ही उनसे रहज़नी की बना रहनुमा जिन्होंने नवाज़ा
पकड़ गिरेबाँ पूछ लो आज ,कब तलक खामोश रहोगे
हाथ खोलो ,घर से निकलो ,कब तलक खामोश रहोगे .

आज फिर एक गांधी अपने घर से पैदल चल दिया है
फिर अपना जीवन आज उसने नाम वतन के कर दिया है
एक रौशनी की आस में तूफ़ान से "दीपक "लड़ लिया है
अब सम्भलों अंधेरों तुमने पहन सफेदी बहुत छल क्या है
लेकर मशाल उतरो सड़क पे ,कब तलक खामोश रहोगे
हाथ खोलो ,घर से निकलो ,कब तलक खामोश रहोगे

@कवि दीपक शर्मा
http://www.kavideepaksharma.com

Friday, 31 December 2010

नया साल मुबारक

आसमान ने सितारों भरी ओढ़ के चादर
ज़मीं का हाथ पकड़ के कहा ! चलो मेरी जान
अपनी औलाद जिसे दुनिया कहती है इंसान
उसकी खुशियों के वास्ते आओ दुआ मांगे

सारे संसार की खुशियाँ उन्हें देना मेरे मौला
उनके सपनो को ताबीर हो हासिल किसी भी हाल
हो उनकी दौलत,शौहरत और इज्ज़त में खूब इजाफा
उनकी हर ख्वाहिश को साकार बनाये नया साल

"दीपक" तेरी देहरी पे जलाते हैं ऐ ! जगतारक
औलांदे सब कुदरत की सबको नया साल मुबारक

दीपक शर्मा
सर्वाधिकार सुरक्षित @ दीपक शर्मा


From Shayar Deepak Sharma

Friday, 5 November 2010

शुभ दीपावली

आतिश से जो जलाये थे गए बुझ चिराग सभी
जो रोशन हुए दिमाग से ना "दीपक "बुझे कभी


From Shayar Deepak Sharma

Sunday, 3 October 2010

राष्ट्रमंडल खेल








बुज़ुर्ग कहते हैं कि बिना आखों देखी बात का भरोसा करना और उस पर अपनी राय कायम कर लेना आदमी की सबसे बड़ी बेबकूफी होती है .हिन्दुस्तानी समाज में एक कहावत कम से कम बच्चा होश सम्हालने के तुरंत बाद सुनना शुरू कर देता है, वो है " कान पर कभी विश्वास मत करो या सुनी -सुनाई बातों का भरोसा कभी मत करो . लेकिन हम भारतीय इन बातों को सिर्फ दूसरों पर इस्तेमाल करने के लिए ही सुनते हैं.अपनी असल ज़िन्दगी में इन पर अमल करने का सवाल ही नहीं पैदा होता.
एक और चीज़ में हमे महारत हासिल है वो है किसी की भी बखिया उधेड़ने की.चाहें कोई भी विषय हो ,कैसा भी मुद्दा हो,किसी का भी ज़नाज़ा निकालने का हमे विरासत में मिला हुनर है. हम बहुत ही सहेजता से अपनी बात को लोगों तक पहुँचाने का लोभ त्याग नहीं पाते और चाँद की चांदनी की प्रशंसा करने की वजाय उसके धब्बे देखना पसंद करते हैं. मतलब सारी बातों का लब्बो-लुआब ये है कि कमियाँ ,मीन-मेख निकालने में अपना कोई सानी नहीं है.जिसकी चाहें उसकी बुराई करवा लो और जितनी चाहे उतनी . हम शायद धनात्मक बात करना भूल से गए हैं ...क्या आपको नहीं लगता ?.कम से कम मुझे तो ऐसा लगता है ... वक़्त मुझे गलत साबित करदे तो ख़ुशी होगी !!!!!!!
हम अपनी उन्नति पर गर्व करने कि वजाय उस पर शर्मिंदा होते है . अपनी उन्नति में भी निंदा के कारण आदतन ढूँढ ही लेते हैं कियोंकि ये हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं इसलिए कुछ भी कहीं भी कह सकते हैं . लेकिन यह आदत हमारे ही लिए अच्छी नहीं है कि हम अपनों की गलतियां निकाल कर उसे सार्वजनिक तौर पर नुमाया करें . चाहे बात घर की हो , गली की हो ,शहर की या फिर देश की . बदनामी और कलंक कभी भी नहीं मिटता .हर घटना एक इतिहास बन जाती है और जीवन भर ख़ुद को ही कचोटती रहती है. अपनी ग़ज़ल के दो शेर कहना चाहूँगा इसी विषय के सन्दर्भ में-
"मेरी ख़ामियां न देख ,मुझमे अच्छाइयाँ तलाश
मैं बुरा ही सही ,तू तो अच्छा इंसान बन जा .
तेरा सवाल है ग़र मुझमे कोई अच्छाई नहीं
मुझे शैतान कह दे और ख़ुद भगवान् बन जा.
यह सब बात मैंने इसलिए कही कि पिछले १० महीनो से हम हर चर्चा में एक ही बात पढ़ ,सुन ,देख रहे हैं कि राष्ट्रमंडल खेल देश को शर्मिंदा कर रहे हैं . हमारा विकास नहीं हो पा रहा सही दिशा में ...रिश्वत का बोलवाला है.ख़र्चा कई सो गुना बड़ गया है अपनी निर्धारित धन सीमा से . क्या हम सफल आयोजन कर पायेंगे ? क्या देश कि साख बच जायेगी ? फलां देश के खिलाड़ी ने आने से मना कर दिया ..फलां देश का नुमाइंदा आकर पहले देखेगा कि रिहाइश के कैसे इन्तिजामात हैं ....अरे जिन लोगों कि औकात नहीं है सामने खड़े होने की वो भी सवाल पूछ रहे हैं..जो अपने घर में २ वक़्त की रोटी नहीं ठीक से खा-खिला सकते वो हमारे छप्पन भोग में कमी निकालने लग जाएँ ..सोचो कैसा लगेगा.. और तो और घर का ही अपने कोई सदस्य बताये कि" भैया खीर में गुड कम है "...ख़ुद सोचो कि मन में कैसा तूफ़ान आएगा .दिल कैसा खून के आंसू रोयेगा .....
लेकिन हमारे अपनों की तो हर लीला न्यारी है ...जयचंद न होते तो पृथ्वीराज न मरते. जिस में खाना ..उसी में छेद करना और गुप्त बातों को भी ढिंढोरा पीट -पीट कर बताना अपनी लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा जो ठहरा.
अपने देश को जाने कितने यतन से खेलों के आयोजन का मौका मिला ...लगभग २८ सालों के अंतराल के बाद दिल्ली फिर गौरवान्वित हुई है इस कुम्भ को आयोजित करके.
हमारे देश की जटिल प्रक्रियाओं से गुज़र कर किसी भी समारोह का विश्वस्तरीय आयोजन करना किसी भी भागीरथी प्रयास से हम नहीं हैं ...जहाँ जीने के लिए मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं वहां पर शहर को विश्वस्तरीय रूप देना किसी भी तरह से कमतर नहीं आंका जाना चाहिए. इसके लिए जिनती भी दिल्ली राज्य सरकार ,खेल मंत्रालय ,आयोजन समिति , केंद्र सरकार की प्रशंसा की जाए बहुत की कम है. दिल्ली सरकार की वजीर-ऐ-ख़ास मोहतरमा शीला दीक्षित जी ने जिस दिलेरी और जोश के साथ इस काम को अपने हाथों में लेकर ,जूनून और दानिशमंदी से मुकाम हासिल करवाया है वो वाकई काबिल-ऐ-तारीफ़ हैं .
दिल्ली का ये रूप शायद कितने साल बाद देखने को मिलता ?
सांप निकला ,कुत्ता सोया,हमाम में गंदगी , बिस्तर ठीक नहीं है .....ये सवालात , ये कमियाँ मेरी नज़र में कोई मायने नहीं रखती अगर आप हाथी पालेंगे तो लीद तो होना लाजिम है मेरे भाई .
लेकिन हकीकत तो कुछ और है जो साथ में लगी तस्वीर ख़ुद व ख़ुद कह रहीं हैं .
खेल करने नहीं चाहिए थे .. रिश्वतखोरी हुई है ..करोड़ों का घपला है ,गरीब देश हैं हम ...यह सब फ़िज़ूल की बाते हैं इस समय . मेहमान घर में आये हुए हैं.उनको मेहमान बनकर रहने दो .ख़ुद भी मेजवानी करो .अपनी फटी चादर आपस में बैठ कर सी लेंगे जब मेहमान घर से विदा हो जायेंगे . खूब जूतम-पैजार कर लेंगे लेकिन बाद में. घोड़ों की दौड़ का शौक़ है तो घोड़े पालने भी होंगे ..अस्तबल भी बनाना पड़ेगा ...साईस भी रखना होगा . वरना पैदल ही चलो? कम से कम रौशनी पाने के लिए तेल और बाती जलाने होंगे ........अपने काव्य शब्दों में कहूं तो ----
"सदा बदलाव का दुनिया विरोध करती है
और फिर बाद में उसी पे शोध करती है
उसी लहर ने बढाई है और ज्यादा रवानी
जो पहलोपहल नदिया का प्रतिरोध करती है .
राजनीति भी होती रहेगी . मुद्दे भी उछालते रहेंगे ..बायकाट भी कर देंगे लेकिन बाद में ..अभी तो देश की इज्ज़त का सवाल है ...किसी भी तरह से कम नहीं होनी चाहिए ...बहुत टोपियाँ उछाल लीं .बहुत तमाशे हो गए .बहुत राजनीति हो गई. अब सब बातें भूलनी होंगी.
हमारी दिल्ली का चेहरा ही बदल गया ,किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही है आजकल .खुदा किसी भी बदनुमा दाग से बचाए रखे ...हम सबको अपने देश की लाज रखनी हैं . हमारी सेना,सुरक्षा कर्मी ,सरकारी महकमे सब जी जान से रात -दिन एक किये हुए हैं ..ताकि ये आयोजन सफल हो जाए और हिन्दुस्तान को जल्दी ओलिम्पिक खेलों के आयोजन का जल्दी सुनहरा मौका मिले.
@कवि दीपक शर्मा
+91 9971693131

Tuesday, 28 September 2010

आँख बंद करके भला तमघन कैसे छट पायेंगे

आँख बंद करके भला तमघन कैसे छट पायेंगे
उठने के लिये जगना होगा , वरना जग से उठ जायेंगे

सिर्फ बातों से, कलम से और बे - सिला तर्कों - बहस से
बात तो हो जायेगी पर हासिल न कुछ कर पायेंगे

नुक्ताचीनी , मगज़मारी , माथापच्ची , बहसबाज़ी
जिस दिन करना छोड़ देंगे नये रास्ते खुल जायेंगे

ऐसी कोई मुश्किल नहीं , जिसका बशर पे तोड़ न हो
जब तोडना ही चाहेंगे तो कैसे मन जुड़ पायेंगे

"दीपक" कैसे कह दिया सच अब तेरा हाफिज़ खुदा
तू अँगुलियों की बात न कर हाथ तक उठ जायेंगे


( सर्वाधिकार सुरक्षित @ दीपक शर्मा )

उपरोक्त ग़ज़ल कवि दीपक शर्मा की अप्रकाशित रचना से ली गई है




Aankh band karke bhala tamghan kaise chat paayenge
Uthne ke liye jagna hoga , warna jag se uth jaayenge.

Sirf baaton se , kalam se, aur be-sila tark-o-bahas se

Baat to ho jaayegi par haasil na kuch kar paayenge.

Nuktachini , magazmari ,
mathapichchi, bahasbaazi
Jis din karna chod denge naye raaste khul jaayenge.

Easi koi mushkil nahi ,jiska bashar pe tod na ho

Jab todna hi chahenge to kaise man jud paayenge

"Deepak" kaise kah diya sach ab tera hafiz khuda
Tu anguliyon ki baat na kar haath tak uth jaayenge


( All right reserved @ Deepak Shrma )

This Gazal is taken from the unpublished creations of Deepak Sharma

Sunday, 1 August 2010

फ्रेंडशिप डे पर दीपक शर्मा कि ओर से आप सब के लिए .....

आप का साथ मुझे हौसला देता है
सादिक़ दोस्त सादिक़ सिला देता है

प्यार तेरा खुदाया करम है मुझ पे
ख्याल तेरा मुझे अक़्सर रुला देता है.

(सर्वाधिकार सुरक्षित @ दीपक शर्मा )

Wednesday, 26 May 2010

सेमल जैसी काया लेकर

सेमल जैसी काया लेकर देखो चंदा आया रे
रौशन जगमग मेरे अंगना देखो उतरा साया रे
पूनो वाली ,रात अमावास जैसी लगती दुनिया को
चांदनी मेरे द्वारे आई ,छाया जग मे उजियारा रे ।

दूध कटोरे माफिक आंखिया,बिन बोले कह देती बतिया
रात बने दिन जगते जगते ,दिन भये सोते सोते रतिया
मुंह से दूध की लार गिरे तो मां ने हाथ फैलाया रे
चांदनी मेरे द्वारे आई ,छाया जग मे उजियारा रे ।

सर्वाधिकार सुरक्षित @ दीपक शर्मा

कवि दीपक शर्मा

Sunday, 7 March 2010

नारी दिवस

From Shayar Deepak Sharma



नारी प्रकृति की मानव समाज को ईश्वर द्वारा बख्शी गई सबसे श्रेष्ठ एवम अतुलनीय मानस कृति है.नारी सम्पूर्ण कायनात है .अपने आप में एक सम्पूर्ण संसार है .नारी ने इस संसार को जिसके हम अंश है जन्मा है.यह सब कुछ जो भी यहाँ मानवीय या दैवीय अथवा किसी भी रूप में बिद्यमान है,इसका परोक्ष रूप से नारी का ही दिया हुआ आशीर्वाद है .हम इस ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकते और न ही होना चाहते हैं . ये हमारा ही दुर्भाग्य है कि हम जिस कोख से पैदा होते हैं उसी को दुत्कारते हैं .उसी को उसका हक नहीं देते .हम नारी से उम्मीद तो करते है पर उसकी उम्मीद नहीं बनते .हम "महिला दिवस "पर इस शक्ति स्वरूपा को प्रणाम करते हैं और नमन करते हैं .....

कवि दीपक शर्मा
सर्वाधिकार @कवि दीपक शर्मा