Saturday, 29 August 2009

ये ताल्लुकात , ये रिश्ते , ये दोस्ती , ये साथ ...

ये ताल्लुकात, ये रिश्ते , ये दोस्ती , ये साथ,
ये हमदर्दियाँ, ये वादे, काँधे पे ऐतबार का हाथ ,
ये हर बात पे कसमें, ये लम्बी - लम्बी करीबी बातें ,
ये जज्बात, ये तोहफे और बेशकीमती सौगातें ,
ये खून का वास्ता , ये रिश्ते - नातों का हवाला
ये हमसफ़र , ये हमकदम , ये हमनवां , ये हमप्याला ,
यकीनन तब तलक हैं जब तक तेरे पास दाने हैं
जिस दिन बिन - दाना हो गया , उस रोज़ बेगाने है ।


आज जो दम तेरा हमसाया होने का भरते हैं
तेरे इशारों से जीते हैं , तेरे कहने से मरते हैं
तेरी हर बात पर सिर हिलते हैं जिनके हामी में,
अच्छाईयाँ ही देखती हैं हस्तियां जो तेरी खामी में
सबकी पैमाईशें भी हैं वही जो तेरे पैमाने हैं
जहाँ पर पाँव तेरे हैं वहां सबके सिरहाने हैं
यकीनन तब तलक हैं जब तक तेरे पास दाने हैं
जिस दिन बिन - दाना हो गया , उस रोज़ बेगाने हैं ।


( उपरोक्त पंक्तियाँ काव्य संकलन " मंज़र " से ली गई है )


सर्वाधिकार सुरक्षित @ कवि दीपक शर्मा
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Thursday, 2 July 2009

आजकल खून में पहली सी रवानी न रही

आजकल खून में पहली सी रवानी न रही
बचपन बचपन न रहा , जवानी जवानी न रही

क्या लिबास क्या त्यौहार,क्या रिवाजों की कहें
अपने तमद्दुन की कोई निशानी न रही

बदलते दौर में हालत हो गए कुछ यूँ
हकीक़त हकीकत न रही , कहानी कहानी न रही

इस कदर छा गए हम पर अजनबी साए
अपनी जुबान तक हिन्दुस्तानी न रही

अपनों में भी गैरों का अहसास है इमरोज़
अब पहली सी खुशहाल जिंदगानी न रही

मुझको हर मंज़र एक सा दीखता है “दीपक ”
रौनक रौनक न रही , वीरानी वीरानी न रही


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दिल में जब तक .....

दिल में जब तक मैं-तू नहीं हम हैं
घर बिखरने के मौके बहुत कम हैं .

कौन खींचेगा भला सेहन में दीवार
प्यार जिंदा हो तो फिर कैसा गम है .

जिस्म की छोडिये बिकने लगी औलादे
तरक्की की राह में यह कैसा ख़म है .

खामियां आज उसकी खूबियाँ हो गई
जेब चाक़ थीं पहले अब खूब दम है .

कतरने चन्द बन गईं औरत का लिबास
तहजीब शर्मिंदा है,शर्म के घर मातम है .

ज़ख्म फिर से सभी जवान होने लगे
बता चारागर तेरा ये कैसा मरहम हैं .

माँ की हंसी संग देखा एक हँसता बच्चा
वाह अल्लाह कितनी सुरीली सरगम हैं .

खेलिए वक़्त से मत खेलने दीजिये इसे
वक़्त का खेल दोस्त बहुत बे- रहम हैं .

चैन-ओ-अमन से जीना ईद के मायने
ज़िन्दगी रोकर बसर करना मोहर्रम है.

हाथ फैला कर संवरेगा वतन का मुक्कदर
उनको यकीन है पर हमें उम्मीद कम है.

राम ही जाने अब सफ़र का अंजाम "दीपक"
टूटती साँसे रहनुमा की और तबियत नम है

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जो रोज़ चलती रही जि़स्म पर गोलियाँ

जो रोज़ चलती रही जि़स्म पर गोलियाँ
और मनती रही खून की होलियाँ
तो एक दिन हकीकत हम भूल जायेंगे
होली और दिवाली से भी घबराएँगे ।
हो न पायेगी पहचान रंग और खून में
जो पानी - सा लहू यूं ही बहता रहा
अपनी परछाई भी खौफ देगी एक दिन
अगर दौर कत्ल का यूँ ही चलता रहा ।
जो छूटते रहे उपद्रवी स्वार्थ पर
फ़र्ज़ लगता रहा स्नेह के दाँव पर
तो और कुछ तो अंजाम होगा नही
बस शवों के कफ़न कम पड़ जायेंगे
अब बातों से कुछ भी न हो पायेगा
न बुझे दीपो की ज्योति लौट पाएगी
तुम कहोगे शान्ति गर बारूद के शोर में
तो ज़र्रों में शान्ति ख़ुद बिखर जायेगी
अरे ! उग्रवाद के कदम रोको ज़रा जोर से
नहीं तो ख़ुद ही के कदम थर्रा जायेंगे
नासूर नश्तर के हाथों मिटा तो ठीक
वरना हिस्से जि़स्म से अलग हो जायेंगे ।


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Sunday, 14 June 2009

राज़ कि एक बात

लो राज़ की बात एक बताते हैं
हम हँसकर अपने ग़म छुपाते हैं,

तन्हा होते तो रो लेते हैं जी भर के
आदतन महफ़िल मे बस मुस्कुराते हैं.

और होंगे जो झुक जाएँ रुतबे के आगे
सिर हम बस उसके दर पर झुकाते हैं

माँ मुझे फिर तेरे आँचल मे सोना है
आजा हसरत से बहुत देख बुलाते हैं

इसे ज़िद समझो या मेरा शौक़"औ"हुनर
चिराग हम तेज़ हवायों मे ही जलाते है

महल"औ"मीनार,दौलत कमाई हैं तुमने
पर प्यार से गैर भी गले हमे लगाते हैं

शराफत हमेशा नज़र झुका कर चलती हैं
निगाह मिलाते हैं हम नज़र नहीं मिलाते हैं

हैं ऊपर वाले की इनायत मुझ पे "दीपक "
वो मिट जाते जो मुझ पर नज़र उठाते हैं



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Friday, 12 June 2009

नही समय किसी का साथी रे !

नहीं समय किसी का साथी रे !
मत हँस इतना औरों पर कि
कल तुझको रोना पड़ जाये
छोड़ नर्म मखमली शैय्या को
गुदड़ पर सोना पड़ जाये
हर नीति यही बतलाती रे !
नहीं समय किसी का साथी रे !

तू इतना ऊँचा उड़ भी न कि
कल धरती के भी काबिल न रहे
इतना न समझ सबसे तू अलग
कल गिनती में भी शामिल न रहे
प्रीति सीख यही सिखलाती रे !
नहीं समय किसी का साथी रे !

रोतों को तू न और रुला
जलते को तू ना और जला
बेबस तन पर मत मार कभी
कंकड़- पत्थर , व्यंग्यों का डला
अश्रु नहीं निकलते आँखों से
जीवन भर जाता आहों से
मन में छाले पड़ जाते हैं
अवसादों के विपदाओं से
कुदरत जब मार लगाती रे !
नहीं समय किसी का साथी रे !

इतना भी ऊँचा सिर न कर
औरों का कद बौना दिखे
इतनी भी ना कर नीचे नज़र
हर चीज़ तुझे नीची दिखे,
खण्ड - खण्ड अस्तित्व हो जाता है
पर लोक, ब्रह्माण्ड हो जाता है
साँसों कि हाट उजड़ जाती
जब संयम प्रचंड हो जाता है
हर सदी यही दोहराती रे !
नहीं समय किसी का साथी रे !

इतना मत इतरा वैभव पर
अस्थिर धन के गौरव पर
पाण्डव का हश्र तुझे याद नहीं
ठोकर खायी थी पग - पग पर
मत हीन समझ औरों को तू
मत दीन समझ औरों को तू
मत हेय दृष्टि औरों पर डाल
मत वहम ग़लत ह्रदय में पाल
पल में पासा फ़िर जाता है
जब प्रकति नयन घुमाती रे !
नहीं समय किसी का साथी रे !

काया पर ऐसा गर्व ना कर
यौवन का इतना दंभ न भर
ना नाज़ कर इतना सुन्दरता पर
द्रग पर, केशों पर, अधरों पर
है नहीं ये कोई पूंजी ऐसी
जो आयु के संग बढती जाये
जैसे - जैसे चढ़ती है उमर
ये वैसे - वैसे घटती जाये
अस्थि - अस्थि झुक जाती रे !
नहीं समय किसी साथी रे !

मत भाग्य किसी का छीन कभी
दाना हक़ से ज्यादा न बीन कभी
चलता रह अपनी परिधि में
पथ औरों का मत छीन कभी
वरना ऐसा भी तो हो जाता है
दाना अपना भी छिन जाता है
परिधि अपनी भी छुट जाती है
और भाग्य ही जड़ हो जाता है
जब एक दिन गगरी भर जाती रे !
नहीं समय किसी का साथी रे !


( उपरोक्त पंक्तियाँ काव्य संकलन फलक दीप्ति से ली गई है )

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Monday, 1 June 2009




बुद्धम शरणं गच्छामि................


दो पल सुख से सोना चाहे पर नींद नही पल को आए
जी मचले हैं बेचैनी से ,रूह ना जाने क्यों अकुलाए
ज्वाला सी जलती हैं तन मे ,उम्मीद हो रही हंगामी .....
बुद्धम शरणं गच्छामि................


मन कहता हैं सब छोड़ दूँ मैं,पर जाने कैसे छुटेगा ये
लालच रोज़ बढ़ता जाता हैं,लगती दरिया सी तपती रेत
जब पूरी होती एक अभिलाषा ,खुद पैदा हो जाती आगामी......
बुद्धम शरणं गच्छामि................


नयनो मे शूल से चुभते हैं, सपने जो अब तक कुवारें हैं
कण से छोटा हैं ये जीवन और थामे सागर कर हमारे हैं
पागल सी घूमती रहती इस चाहत मे जिन्दगी बे-नामी........
बुद्धम शरणं गच्छामि................


ईश्वर हर लो मन से सारी, मोह माया जैसी बीमारी
लालच को दे दो एक कफ़न ,ईर्ष्या को बेवा की साड़ी
मैं चाहूँ बस मानव बनना ,मांगू कंठी हरि नामी ....

बुद्धम शरणं गच्छामि................


(उपरोक्त रचना कवि दीपक शर्मा की अप्रकाशित रचना है। सर्वाधिकार सुरक्षित @ कवि दीपक शर्मा )


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