Monday, 1 June 2009




बुद्धम शरणं गच्छामि................


दो पल सुख से सोना चाहे पर नींद नही पल को आए
जी मचले हैं बेचैनी से ,रूह ना जाने क्यों अकुलाए
ज्वाला सी जलती हैं तन मे ,उम्मीद हो रही हंगामी .....
बुद्धम शरणं गच्छामि................


मन कहता हैं सब छोड़ दूँ मैं,पर जाने कैसे छुटेगा ये
लालच रोज़ बढ़ता जाता हैं,लगती दरिया सी तपती रेत
जब पूरी होती एक अभिलाषा ,खुद पैदा हो जाती आगामी......
बुद्धम शरणं गच्छामि................


नयनो मे शूल से चुभते हैं, सपने जो अब तक कुवारें हैं
कण से छोटा हैं ये जीवन और थामे सागर कर हमारे हैं
पागल सी घूमती रहती इस चाहत मे जिन्दगी बे-नामी........
बुद्धम शरणं गच्छामि................


ईश्वर हर लो मन से सारी, मोह माया जैसी बीमारी
लालच को दे दो एक कफ़न ,ईर्ष्या को बेवा की साड़ी
मैं चाहूँ बस मानव बनना ,मांगू कंठी हरि नामी ....

बुद्धम शरणं गच्छामि................


(उपरोक्त रचना कवि दीपक शर्मा की अप्रकाशित रचना है। सर्वाधिकार सुरक्षित @ कवि दीपक शर्मा )


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Sunday, 1 March 2009

ग़ज़ल

मेरे हाथों से तेरा हाथ यूँ छूटता गया ,
जैसे सितारा फलक से टूटता गया ।

गम ये नही की लुट गई हसरते - हयात
ग़म है जिसे नहीं लूटना था लूटता गया ।

बदकिस्मती कहूँ इसे या और कुछ कहूँ
जिसको भी दिल ने चाहा वही रूठता गया ।

मिलने थे जहाँ साये बिछुडे वहां पर हम
साहिल पे बदनसीब कोई डूबता गया ।

हंसती रही हयात मगर रोते रहे जज़्बात
अन्दर ही अन्दर दरख्त कोई सूखता गया

सारे जहाँ का "दीपक" इतना अफसाना है
गुल टूटता गया और गुंचा फूटता गया ।


(उपरोक्त ग़ज़ल काव्य संकलन falakdipti से ली गई है )



ग़ज़ल

साँस जाने बोझ कैसे जीवन का जीती रही
नयन बिन अश्रु रहे पर ज़िन्दगी रोती रही ।

एक नाजुक ख्वाब का अंजाम कुछ ऐसा हुआ
मैं तड़पता रहा इधर वो उस तरफ रोती रही ।

भूख, आंसू और गम ने उम्र तक पीछा किया
मेहनत के रुख पर जर्दियाँ, तन पे फटी धोती रही ।

उस महल के बिस्तरे पर रोते रहे कुत्ते - बिल्लियाँ
धूप में पिछवाड़े एक बच्ची छोटी रोती रही ।

आज तो उस मां ने जैसे - तैसे बच्चे सुला दिए
कल की फ़िक्र पर रात भर दामन भिगोती रही ।

तंग आकर मुफलिसी से खुदकुशी कर ली मगर
दो गज कफ़न को लाश उसकी बात जोहती रही ।

'दीपक' बशर की ख्वाहिशों का कद इतना बढ गया
ख्वाहिशों की भीड़ में कहीं ज़िन्दगी खोती रही ।

( उपरोक्त ग़ज़ल काव्य संकलन मंज़र से ली गई है )

ग़ज़ल

जिस पर मुझे जरूरत से ज्यादा गुमान था
दिल उस शख्श का बहुत बेईमान था ।

बिखरा हुआ पढ़ा था एक साया उसके पास
कोई अजनबी नहीं वो मेरा अरमान था ।

कहकहों में बज्म के दब गई सिसकी मेरी
मामूली थी हस्ती मेरी , बहुत छोटा निशान था ।

खुश था जिसे फूंककर मज़हबी जूनून में
बाद में मालुम हुआ वो मेरा मकान था ।

दोस्ती भी दोस्तों ने निभाई तो किस जगह
बस जिंदगी से चार कदम दूर शमशान था ।

भूख का कोई कहीं मज़हब 'दीपक' होता नहीं
काफिर के साथ खा गया जो मुसलमान था ।

( उपरोक्त ग़ज़ल काव्य संकलन मंज़र से ली गई है )

ग़ज़ल

तेरी हर बात पे हम ऐतबार करते रहे
तुम हमें छलते रहे,हम तुमसे प्यार करते रहे ।

कोशिशें करते तो शायद मंजिले मिल जाती
मगर अफ़सोस तुम वादे हज़ार करते रहे ।

नाम भी मेरा उन्हें याद तक नहीं आया
जिनको अपनों मे हम शुमार करते रहे ।

मुझको मालूम था तुम नहीं आओगे फिर भी
एक उम्मीद सी लिए इन्तिज़ार करते रहे ।

ज़िन्दगी यूँ तो गुज़र रही है पहले की तरह
पर घाव पिछले कुछ जीना दुश्वार करते रहे ।

याद आते ही तुम्हारी सीने के समंदर से
अश्क भर -भर के नयन बौछार करते रहे ।

एक घर में कहकहे और शहनाई की आवाज़
'दीपक' अरमान मेरा तार - तार करते रहे


( उपरोक्त ग़ज़ल काव्य संकलन मंज़र से ली गई है )